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Friday, 13 May 2016

क्या किसी की रफ़्तार प्रकाश से भी तेज़ है?

हम सब जानते हैं कि दुनिया में सबसे तेज़ रफ़्तार प्रकाश की होती है. जितनी तेज़ी से प्रकाश दूरी तय करता है, कोई और चीज़ उस रफ़्तार को छू तक नहीं सकती. मगर सितंबर 2011 में स्विस वैज्ञानिक एंतोनियो एरेडिटाटो ने दुनिया को चौंका दिया था. एंटोनियो ने दावा किया था कि न्यूट्रिनो नाम के कुछ कणों ने प्रकाश से भी तेज़ रफ़्तार से दूरी तय की थी. एंटोनियो और उनके साथ 160 दूसरे वैज्ञानिक, बर्न यूनिवर्सिटी में 'ओपेरा प्रोजेक्ट' पर काम कर रहे थे. आइंस्टाइन के सापेक्षता के सिद्धांत या 'थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी' के मुताबिक़, ऐसा मुमकिन ही नहीं कि कोई और चीज़ प्रकाश से तेज़ चाल से दूरी तय कर सके. अगर ऐसा होता है तो भौतिक विज्ञान के कई नियमों को बदलना होगा. हालांकि एंटोनियों और उनके साथियों को अपने दावे पर काफ़ी भरोसा था. मगर उन्हें इस बात का ऐतबार नहीं था कि उनके प्रयोग के नतीजे एकदम सही थे. वो तो कुछ और वैज्ञानिकों से मदद मांग रहे थे कि उनके प्रयोग के नतीजे समझा सकें. आख़िर में पाया ये गया कि 'ओपेरा प्रोजेक्ट' के नतीजे ग़लत थे. एक तार में गड़बड़ी की वजह से एंटोनियो और उनके साथियों के प्रयोग के नतीजे ग़लत आए थे. इसीलिए वैज्ञानिकों को लगा था कि न्यूट्रिनो ने प्रकाश से ज़्यादा रफ़्तार हासिल कर ली थी. ये प्रयोग महीनों के बाद हुआ था. हालांकि बहुत से लोगों ने कहा कि इस तरह के मुश्किल प्रयोगों में ऐसी ग़लतियां हो ही जाती हैं. फिर भी जब इसके नतीजों के ग़लत होने की बात सामने आई तो एंटोनियो को इस्तीफ़ा देना पड़ा. सवाल ये है कि किसी चीज़ के प्रकाश से तेज़ चलने के दावे में इतनी बड़ी बात क्यों है? क्या वाक़ई कोई ऐसी चीज़ नहीं जो प्रकाश से ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से चल सके? निर्वात या वैक्यूम में प्रकाश की रफ़्तार 299,792.458 किलोमीटर प्रति सेकेंड होती है. ये बहुत ही तेज़ है. क़रीब 3 लाख़ किलोमीटर प्रति सेकेंड. सूरज, धरती से क़रीब पंद्रह करोड़ किलोमीटर दूर है. मगर सूरज की रोशनी को धरती तक पहुंचने में सिर्फ़ 8 मिनट और बीस सेकेंड लगते हैं. क्या इंसान की बनाई कोई ऐसी चीज़ है जो इस रफ़्तार से चल सके? इंसान की बनाई सबसे तेज़ रफ़्तार मशीन है, 'न्यू होराइज़न स्पेसक्राफ्ट'. ये अभी हाल ही में प्लूटो और शैरोन ग्रहों के पास से गुज़रा है. इसकी रफ़्तार सोलह किलोमीटर प्रति सेकेंड है. कहां तो प्रकाश की तीन लाख़ किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ़्तार और कहां सोलह किलोमीटर प्रति सेकेंड. कोई मुक़ाबला ही नहीं. हालांकि इंसान ने कुछ पार्टिकिल ऐसे बनाए हैं जो काफ़ी तेज़ी से चलते हैं. जैसे साठ के दशक में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक विलियम बर्तोजी ने कुछ इलेक्ट्रॉन्स को तेज़ रफ़्तार देने में कामयाबी हासिल की थी. वैसे कुछ लोग सोचते होंगे कि किसी चीज़ पर ज़्यादा ज़ोर लगाकर उसे तेज़ रफ़्तार से चलाया जा सकता है. मगर ऐसा मुमकिन नहीं. बर्तोजी के प्रयोग में भी ये पता चला कि ज़रा सी भी रफ़्तार बढ़ाने के लिए इलेक्ट्रॉन्स पर बहुत ताक़त या ऊर्जा झोंकनी पड़ेगी. इससे इलेकट्रॉनों की रफ़्तार प्रकाश के क़रीब तो पहुंची मगर उसके बराबर कभी नहीं हुई. प्रकाश, फोटॉन से बनता है, जो इलेक्ट्रॉन के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से चल सकते हैं. आख़िर इलेक्ट्रॉन ऐसी रफ़्तार क्यों नहीं हासिल कर सकते? मेलबर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक रोजर रसूल इसकी वजह बताते हैं. वो कहते हैं कि जैसे-जैसे कोई चीज़ रफ़्तार पकड़ती है, वो भारी होती जाती है. इसीलिए उसका प्रकाश की रफ़्तार हासिल कर पाना संभव नहीं होता. वहीं फोटॉन्स का कोई वज़न नहीं होता. अगर इसमें कोई वज़न होता तो इसका भी तीन लाख़ किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ़्तार से चल पाना मुमकिन नहीं होता. फोटॉन्स की एक और ख़ूबी होती है. उन्हें चलने के लिए रफ़्तार पैदा करने की ज़रूरत नहीं होती. जैसे ही फोटॉन बनते हैं वैसे ही वो टॉप स्पीड पकड़ लेते हैं. वैसे प्रकाश तो ऊर्जा है. मगर ये फोटॉन से बनी हुई ऊर्जा है. कई बार ये भी औसत रफ़्तार से कम गति से चलती है. वैसे इंटरनेट के इंजीनियर ये दावा करते हैं कि ऑप्टिकल फाइबर में प्रकाश की रफ़्तार से डेटा चलता है. मगर सच ये है कि इन ऑप्टिकल फाइबर में प्रकाश की रफ़्तार चालीस फ़ीसद तक कम हो जाती है. प्रकाश के फोटॉन तो उसी स्पीड से चलते हैं. मगर शीशे से निकलने वाले फोटॉन प्रकाश की रफ़्तार को कम कर देते हैं. फिर भी औसतन, प्रकाश की रफ़्तार तीन लाख़ किलोमीटर प्रति सेकेंड है. हम ऐसी कोई भी चीज़ नहीं बना सके हैं जो इस स्पीड के क़रीब भी पहुंच सके. सवाल ये है कि आख़िर ये क्यों ज़रूरी है कि प्रकाश की रफ़्तार इतनी ही तेज़ है और वो सबसे तेज़ चलने वाली चीज़ है? इसके पीछे वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन की 'थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी' है. आप चाहे कहीं भी रहें. किसी भी रफ़्तार से चलें. प्रकाश की रफ़्तार वही रहेगी. वैसे कुछ प्रयोगों में प्रकाश की रफ़्तार में फ़र्क़ साबित किया गया है. फिर भी आइंस्टाइन की थ्योरी पर भरोसा करना ही बेहतर है. वजह ये है कि प्रकाश का अपना कोई वज़न होता नहीं. तो इस पर किसी बाहरी चीज़ या वजह का असर नहीं पड़ता. इस नियम के कुछ अपवाद भले हों. लेकिन, हमारा ब्रह्मांड इसी बुनियादी नियम पर आधारित है जो कहता है कि प्रकाश सबसे तेज़ रफ़्तार चीज़ है. अब उन अपवादों की बात करें जो इस थ्योरी को चुनौती देते हैं. पहली बात तो ये कि भले ही अब तक कोई चीज़ प्रकाश से तेज़ स्पीड नहीं पकड़ सकी है. लेकिन ये मानना ग़लत है कि ऐसा मुमकिन ही नहीं. कुछ ख़ास हालात में ऐसा हो भी सकता है. आकाशगंगा को ही लें. इसमें कई ब्रह्मांड हैं. जो एक दूसरे से दूर हो रहे हैं. इनकी रफ़्तार रोशनी से भी तेज़ है.

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